✨❄ इस़लाहे़ अग़लात़: अ़वाम में राएज ग़लतियों की इसलाह़ ❄✨
सिलसिला 35:
🌻 *नमाज़ की रकआ़तों में शक हो जाने का हु़क्म और उस का ह़ल*
🌼 *नमाज़ में शक पैदा होने की अफसोसनाक सूरते हा़ल:*
नमाज़ अदा करते वक़्त बहुत से लोगों को किसी मरहले में शक पैदा हो जाता है कि फलां रुक्न (और फलां फ़र्ज़ व वाजिब) अदा किया या नहीं किया, फलां अ़मल एक बार किया या दो बार किया, इसी तरह यह शक भी आ़म है कि कितनी रकआ़त अदा की हैं? और यह शक पैदा होने का मसअला ब-कसरत (और बहुत ज़्यादा) पेश आने लगा है बल्कि अफसोसनाक ह़द तक बढ़ता ही चला जाता है।
🌼 *नमाज़ में शक पैदा होने की एक बड़ी वजह:*
नमाज़ में शक पैदा होने की मुतअ़द्दिद वुजूहात (और कई वजहें) हो सकती हैं, जिन में से एक बड़ी वजह यह है कि हम नमाज़ जैसी अ़ज़ीम इ़बादत भरपूर तवज्जोह और ध्यान के साथ अदा नहीं करते, बल्कि नमाज़ के दौरान हम मुख्तलिफ (और तरह तरह की) सोचों में मगन रहते हैं, जिस के नतीजे में हम भूल जाते हैं और इसी से शक वुजूद पाता है।
🌼 *नमाज़ में शक हो जाने से मुतअ़ल्लिक़ एक ग़लती की इसलाह:*
चूंकि हमारे हां दीनी तालीमात तफ़्सीली तौर पर सीखने का उ़मूमी मिज़ाज नहीं है, इस लिए उन्हें यह भी इल्म नहीं होता कि नमाज़ में शक हो जाने के बाद क्या करना चाहिए, बल्कि वह अपनी तरफ से एक खुद साखता (और अपनी तरफ से बनाया हुआ) हल तजवीज़ करके नमाज़ पूरी कर लेते हैं! हालांकि यह हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह इस अमल से मुतअ़ल्लिक़ तफ़्सीली इ़ल्म हासिल करे।
🌼 *नमाज़ में शक से बचने का एक आसान ह़ल:*
माक़ब्ल से (ऊपर) यह बात वाज़ेह़ हुई कि जब नमाज़ ध्यान और तवज्जोह से अदा ना की जाए, तो उस में शक पैदा होने के इमकानात (और चांस) बढ़ जाते हैं, इस लिए अगर हम नमाज़ को भरपूर ध्यान और तवज्जोह से सुन्नत के मुताबिक़ अदा करेंगे, तो बहुत से वसाविस (वस्वसे) और शक खुद बखुद ख़त्म हो जाएंगे इन शा अल्लाह।
ज़ैल में (नीचे) नमाज़ की रकआ़त में शक हो जाने से मुतअ़ल्लिक़ मसअला तफ़्सील से ज़िक्र किया जाता है ताकि शक पैदा होने की सूरत में उस के मुताबिक़ अमल किया जा सके।
🌼 *नमाज़ की रकअ़तों में शक हो जाने का हुक्म:*
अगर किसी को नमाज़ ही में नमाज़ की रकआ़त से मुताल्लिक़ शक हो जाए कि कितनी रकआ़त अदा की हैं, तो अगर उसको इत्तिफ़ाक़ से शक हुआ हो (बार बार शक ना होता हो) तो सलाम फेर कर नमाज़ ख़त्म करके दोबारा से शुरू करे, लेकिन अगर उसको शक होता रहता हो जैसा कि आजकल बहुत से हज़रात को बकसरत (बहुत ज़्यादा) शक होने की बीमारी होती है तो ऐसी सूरत में वो ग़ालिब (और अक्सर) गुमान पर अ़मल करे, (यानी) जिस तरफ ज़्यादा दिल माइल हो जाए (और दिल का झुकाव जिस बात की तरफ़ ज़्यादा हो) तो उसी को अपनाए, लेकिन अगर ग़ालिब गुमान ना होता हो (किसी एक बात की तरफ दिल ज़्यादा ना झुकता हो) तो ऐसी सूरत में वो यक़ीनी पहलू को ले यानी अगर एक और दो रकआ़त में शक हो (कि एक रकआ़त पढ़ी या दो रकआ़त, और किसी एक बात की तरफ़ ज़्यादा गुमान ना हो बल्कि बराबर हो) तो चूँकि एक यक़ीनी है इस लिये एक ही को इख़्तियार करे (और एक ही रकआ़त माने) , इसी तरह दो और तीन रकआ़त में शक हो तो दो को, और अगर तीन और चार में शक हो तो तीन को इख़्तियार करे, और इन सब सूरतों में आख़िर में सजदा सहू भी करे, इसकी तफ़्सील ये है कि:
1️⃣ अगर ये शक हो कि ये पहली रकअ़त है या दूसरी तो इसको एक रकअ़त ही समझ ले, अलबत्ता इस पहली रकअ़त में भी बैठ कर अत्तहिय्यात और तशह्हुद पढ़े, कियोंकि हो सकता है कि ये दूसरी रकअ़त हो फिर जब दूसरी रकअ़त अदा करे तो इसमें फ़ातिहा के बाद सूरत भी मिला ले और इसमें भी बैठ कर अत्तहिय्यात और तशह्हुद पढ़े, फिर (अगर तीन या चार रकआ़त वाली नमाज़ है तो) तीसरी रकअ़त अदा करके उसमें भी बैठ जाए, फिर चौथी रकअ़त अदा करके आख़िर में सजदा सहू करे।
2️⃣ अगर ये शक हो कि दूसरी रकअ़त है या तीसरी, तो ऐसी सूरत में दूसरी रकअ़त में भी बैठ कर अत्तहि़य्यात और तशह्हुद पढ़े, इसी तरह तीसरी रकअ़त में भी बैठ कर अत्तहि़य्यात और तशह्हुद पढ़े, फिर चौथी रकअ़त अदा करके आख़िर में सजदा सहू करले।
अगर ये शक हो कि तीन पढ़ी हैं या चार, तो इसको तीन रकआ़त ही समझे, और एक रकअ़त और मिला ले, लेकिन इस सूरत में तीसरी रकअ़त पर भी बैठ कर अत्तहि़य्यात और तशह्हुद पढ़े, फिर चौथी रकअ़त अदा करके आख़िर में सजदा सहू करे।
🌼 *नमाज़ के बाद रकआ़त से मुताल्लिक़ शक हो जाने का हुक्म:*
अगर नमाज़ के बाद रकआ़त से मुतअ़ल्लिक़ शक हो जाए कि जैसे तीन रकआत अदा की हैं या चार, तो इस शक का कोई ऐतबार नहीं, बल्कि नमाज़ दुरुस्त है। अलबत्ता अगर उसको यक़ीन हो जाए कि वाक़ई एक रकअ़त बाक़ी है तो अगर उसने सलाम के बाद बातें ना की हों, या उसका सीना क़िब्ले से ना फिरा हो या कोई और ऐसा काम ना किया हो जो (नमाज़ की ह़ालत में) नमाज़ को तोड़ देता हो तो उठ कर वो रकअ़त मुकम्मल करले और आख़िर में सजदा सहू करे।
(और अगर नमाज़ के बाद ऐसा काम कर लिया हो जो नमाज़ की हालत में नमाज़ को तोड़ देता हो, फ़िर याद आए कि वाक़ई (मिसाल के तौर पर) एक रकअ़त छूट गई, तो अब दोबारा नमाज़ पढ़े।)
(मुलाह़जा फरमाएं: रद्दुल मुह़तार, बहश्ती ज़ेवर)
❄ *فقہی عبارات*
☀️الدر المختار میں ہے:
(وَإِذَا شَكَّ) فِي صَلَاتِهِ (مَنْ لَمْ يَكُنْ ذَلِكَ) أَي الشَّكُّ (عَادَةً لَهُ) وَقِيلَ: مَنْ لَمْ يَشُكَّ فِي صَلَاةٍ قَطُّ بَعْدَ بُلُوغِهِ، وَعَلَيْهِ أَكْثَرُ الْمَشَايِخِ، «بَحْرٌ» عَن «الْخُلَاصَةِ». (كَمْ صَلَّى اسْتَأْنَفَ) بِعَمَلٍ مُنَافٍ وَبِالسَّلَامِ قَاعِدًا أَوْلَى؛ لِأَنَّهُ الْمَحَلُّ، (وَإِنْ كَثُرَ) شَكُّهُ (عَمِلَ بِغَالِبِ ظَنِّهِ إنْ كَانَ) لَهُ ظَنٌّ؛ لِلْحَرَجِ، (وَإِلَّا أَخَذَ بِالْأَقَلِّ)؛ لِتَيَقُّنِهِ (وَقَعَدَ فِي كُلِّ مَوْضِعٍ تَوَهَّمَهُ مَوْضِعَ قُعُودِهِ) وَلَوْ وَاجِبًا؛ لِئَلَّا يَصِيرَ تَارِكًا فَرْضَ الْقُعُودِ أَوْ وَاجِبَهُ.
☀️ رد المحتار میں ہے:
(قَوْلُهُ: وَإِذَا شَكَّ) هُوَ تَسَاوِي الْأَمْرَيْنِ، «بَحْرٌ» وَقَدَّمْنَاهُ، (قَوْلُهُ: فِي صَلَاتِهِ) قَالَ فِي «فَتْحِ الْقَدِيرِ»: قَيَّدَ بِهِ؛ لِأَنَّهُ لَوْ شَكَّ بَعْدَ الْفَرَاغِ مِنْهَا أَوْ بَعْدَ مَا قَعَدَ قَدْرَ التَّشَهُّدِ لَا يُعْتَبَرُ، إلَّا إذَا وَقَعَ فِي التَّعْيِينِ فَقَطْ بِأَنْ تَذَكَّرَ بَعْدَ الْفَرَاغِ أَنَّهُ تَرَكَ فَرْضًا وَشَكَّ فِي تَعَيُّنِهِ قَالُوا: يَسْجُدُ سَجْدَةً ثُمَّ يَقْعُدُ ثُمَّ يُصَلِّي رَكْعَةً بِسَجْدَتَيْنِ ثُمَّ يَقْعُدُ ثُمَّ يَسْجُدُ لِلسَّهْوِ؛ لِاحْتِمَالِ أَنَّ الْمَتْرُوكَ الرُّكُوعُ فَيَكُونُ السُّجُودُ لَغْوًا بِدُونِهِ، فَلَا بُدَّ مِنْ رَكْعَةٍ بِسَجْدَتَيْنِ. اهـ. قَالَ فِي «الْبَحْرِ»: وَلَا حَاجَةَ إلَى هَذَا الِاسْتِثْنَاءِ؛ لِأَنَّ الْكَلَامَ فِي الشَّكِّ بَعْدَ الْفَرَاغِ وَهَذَا تَيَقَّنَ تَرْكَ رُكْنٍ غَيْرَ أَنَّهُ شَكَّ فِي تَعْيِينِهِ، نَعَمْ يُسْتَثْنَى مَا فِي «الْخُلَاصَةِ»: لَوْ أَخْبَرَهُ عَدْلٌ بَعْدَ السَّلَامِ أَنَّك صَلَّيْت الظُّهْرَ ثَلَاثًا وَشَكَّ فِي صِدْقِهِ يُعِيدُ احْتِيَاطًا؛ لِأَنَّ الشَّكَّ فِي صِدْقِهِ شَكٌّ فِي الصَّلَاةِ. (قَوْلُهُ: مَنْ لَمْ يَكُنْ ذَلِكَ عَادَةً لَهُ) هَذَا قَوْلُ شَمْسِ الْأَئِمَّةِ السَّرَخْسِيِّ وَاخْتَارَهُ فِي «الْبَدَائِعِ»، وَنَصَّ فِي «الذَّخِيرَةِ» عَلَى أَنَّهُ الْأَشْبَهُ. قَالَ فِي «الْحلْبةِ»: وَهُوَ كَذَلِكَ. وَقَالَ فَخْرُ الْإِسْلَامِ: مَنْ لَمْ يَقَعْ لَهُ فِي هَذِهِ الصَّلَاةِ وَاخْتَارَهُ ابْنُ الْفَضْلِ. (قَوْلُهُ: وَقِيلَ إلَخْ) ثَمَرَةُ الْخِلَافِ تَظْهَرُ فِيمَا لَوْ سَهَا فِي صَلَاتِهِ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَاسْتَقْبَلَ ثُمَّ لَمْ يَسْهُ سِنِينَ ثُمَّ سَهَا، فَعَلَى قَوْلِ السَّرَخْسِيِّ يَسْتَأْنِفُ؛ لِأَنَّهُ لَمْ يَكُنْ مِنْ عَادَتِهِ، وَإِنَّمَا حَصَلَ لَهُ مَرَّةً وَاحِدَةً، وَالْعَادَةُ إنَّمَا هِيَ مِنْ الْمُعَاوَدَةِ أَيْ وَالشَّرْطُ أَنْ لَا يَكُونَ مُعْتَادًا لَهُ قَبْلَ هَذِهِ الصَّلَاةِ، وَكَذَا عَلَى قَوْلِ فَخْرِ الْإِسْلَامِ، خِلَافًا لِمَا وَقَعَ فِي «السِّرَاجِ» مِنْ أَنَّهُ يَتَحَرَّى كَمَا يَتَحَرَّى عَلَى الْقَوْلِ الثَّالِثِ كَمَا فِي «الْبَحْرِ». وَفِي عِبَارَةِ «النَّهْرِ» هُنَا سَهْوٌ فَاجْتَنِبْهُ. (قَوْلُهُ: كَمْ صَلَّى) أَشَارَ بِالْكَمِّيَّةِ إلَى أَنَّ الشَّكَّ فِي الْعَدَدِ، فَلَوْ فِي الصِّفَةِ كَمَا لَوْ شَكَّ فِي ثَانِيَةِ الظُّهْرِ أَنَّهُ فِي الْعَصْرِ وَفِي الثَّالِثَةِ أَنَّهُ فِي التَّطَوُّعِ وَفِي الرَّابِعَةِ أَنَّهُ فِي الظُّهْرِ، قَالُوا: يَكُونُ فِي الظُّهْرِ، وَلَا عِبْرَةَ بِالشَّكِّ، وَتَمَامُهُ فِي «الْبَحْرِ». (قَوْلُهُ: اسْتَأْنَفَ بِعَمَلٍ مَنَافٍ إلَخْ) فَلَا يَخْرُجُ بِمُجَرَّدِ النِّيَّةِ، كَذَا قَالُوا. وَظَاهِرُهُ أَنَّهُ لَا بُدَّ مِنْ الْعَمَلِ فَلَوْ لَمْ يَأْتِ بِمُنَافٍ وَأَكْمَلَهَا عَلَى غَالِبِ ظَنِّهِ لَمْ تَبْطُلْ إلَّا أَنَّهَا تَكُونُ نَفْلًا وَيَلْزَمُهُ أَدَاءُ الْفَرْضِ، وَلَوْ كَانَتْ نَفْلًا يَنْبَغِي أَنْ يَلْزَمَهُ قَضَاؤُهُ وَإِنْ أَكْمَلَهَا لِوُجُوبِ الِاسْتِئْنَافِ عَلَيْهِ، «بَحْرٌ»، وَأَقَرَّهُ فِي «النَّهْرِ» وَالْمَقْدِسِيُّ. (قَوْلُهُ: وَإِنْ كَثُرَ شَكُّهُ) بِأَنْ عَرَضَ لَهُ مَرَّتَيْنِ فِي عُمْرِهِ عَلَى مَا عَلَيْهِ أَكْثَرُهُمْ، أَوْ فِي صَلَاتِهِ عَلَى مَا اخْتَارَهُ فَخْرُ الْإِسْلَامِ.
وَفِي «الْمُجْتَبَى»: وَقِيلَ: مَرَّتَيْنِ فِي سَنَةٍ، وَلَعَلَّهُ عَلَى قَوْلِ السَّرَخْسِيِّ، «بَحْرٌ» وَ«نَهْرٌ». (قَوْلُهُ: لِلْحَرَجِ) أَيْ فِي تَكْلِيفِهِ بِالْعَمَلِ بِالْيَقِينِ. (قَوْلُهُ: وَإِلَّا) أَيْ وَإِنْ لَمْ يَغْلِبْ عَلَى ظَنِّهِ شَيْءٌ، فَلَوْ شَكَّ أَنَّهَا أُولَى الظُّهْرِ أَوْ ثَانِيَتُهُ يَجْعَلُهَا الْأُولَى ثُمَّ يَقْعُدُ؛ لِاحْتِمَالِ أَنَّهَا الثَّانِيَةُ ثُمَّ يُصَلِّي رَكْعَةً ثُمَّ يَقْعُدُ لِمَا قُلْنَا ثُمَّ يُصَلِّي رَكْعَةً وَيَقْعُدُ؛ لِاحْتِمَالِ أَنَّهَا الرَّابِعَةُ ثُمَّ يُصَلِّي أُخْرَى وَيَقْعُدُ لِمَا قُلْنَا، فَيَأْتِي بِأَرْبَعِ قَعَدَاتٍ قَعْدَتَانِ مَفْرُوضَتَانِ وَهُمَا الثَّالِثَةُ وَالرَّابِعَةُ، وَقَعْدَتَانِ وَاجِبَتَانِ؛ وَلَوْ شَكَّ أَنَّهَا الثَّانِيَةُ أَو الثَّالِثَةُ أَتَمَّهَا وَقَعَدَ ثُمَّ صَلَّى أُخْرَى وَقَعَدَ ثُمَّ الرَّابِعَةَ وَقَعَدَ، وَتَمَامُهُ فِي «الْبَحْرِ» وَسَيُذْكَرُ عَن «السِّرَاجِ» أَنَّهُ يَسْجُدُ لِلسَّهْوِ. (قَوْلُهُ: وَلَوْ وَاجِبًا) مَعْطُوفٌ عَلَى مَحْذُوفٍ أَيْ: فَرْضًا كَانَ الْقُعُودُ وَلَوْ وَاجِبًا أَوْ إذَا كَانَ فَرْضًا وَلَوْ وَاجِبًا فَكَذَلِكَ عَلَى حَذْفِ جَوَابِ «لَو» الشَّرْطِيَّةِ فَالتَّعْلِيلُ نَاظِرٌ إلَى الْمَذْكُورِ وَالْمَحْذُوفِ. هَذَا وَقَوْلُ «الْهِدَايَةِ» وَ«الْوِقَايَةِ» يَقْعُدُ فِي كُلِّ مَوْضِعٍ يُتَوَهَّمُ أَنَّهُ آخِرُ صَلَاتِهِ يَدُلُّ عَلَى أَنَّهُ لَا يَقْعُدُ عَلَى الثَّانِيَةِ وَالثَّالِثَةِ، وَلِذَا نَسَبَهُ فِي «الْفَتْحِ» إلَى الْقُصُورِ، وَاعْتَذَرَ عَنْهُ فِي «الْبَحْرِ» بِأَنَّ فِيهِ خِلَافًا فَلَعَلَّهُ بَنَاهُ عَلَى أَحَدِ الْقَوْلَيْنِ وَإِنْ كَانَ الظَّاهِرُ الْقُعُودَ مُطْلَقًا. اهـ. قُلْت: لَكِنْ فِي «الْقُهُسْتَانِيِّ» عَن «الْمُضْمَرَاتِ» أَنَّ الصَّحِيحَ أَنَّهُ لَا يَقْعُدُ عَلَى الثَّانِيَةِ وَالثَّالِثَةِ؛ لِأَنَّهُ مُضْطَرٌّ بَيْنَ تَرْكِ الْوَاجِبِ وَإِتْيَانِ الْبِدْعَةِ، وَالْأَوَّلُ أَوْلَى مِن الثَّانِي، ثُمَّ قَالَ: لَكِنَّ فِيهِ اخْتِلَافَ الْمَشَايِخِ اهـ. أَقُولُ: يُؤَيِّدُ مَا فِي «الْفَتْحِ» مَا صَرَّحُوا بِهِ فِي عِدَّةِ كُتُبٍ أَنَّ مَا تَرَدَّدَ بَيْنَ الْبِدْعَةِ وَالْوَاجِب يَأْتِي بِهِ احْتِيَاطًا، بِخِلَافِ مَا تَرَدَّدَ بَيْنَ الْبِدْعَةِ وَالسُّنَّةِ.
(باب سجود السهو)
✍🏻: मुफ्ती मुबीनुर रह़मान साह़ब दामत बरकातुहुम
फाज़िल जामिआ़ दारुल उ़लूम कराची
हिंदी तर्जुमा व तसहील:
अल्तमश आ़लम क़ासमी
9084199927

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