✨❄️ इस्लाह़-ए-अग़लात: अ़वाम में राइज़ ग़लतियों की इस्लाह़ ❄️✨
सिलसिला नंबर 400:
🌻 बिदअ़त की ह़क़ीक़त और जश्न-ए-ई़द मीलादुन्नबी ﷺ
बन्दे (मुफ़्ती मुबीनुर्रह़मान साह़ब) ने गुज़िश्ता साल इस सिलसिला "इस्लाह-ए-अगलात" के छः सिलसिले यानी सिलसिला नंबर 44 से 49 तक माह-ए-रबीउ़ल-अव्वल के फ़ज़ाइल व अहकाम से मुताल्लिक़ तहरीर किए थे, जिनका मजमूआ "माह-ए-रबीउल-अव्वल: हक़ीक़त, फ़ज़ीलत, आमाल और बिदआत" के नाम से रिसाले की सूरत में आ़म हो चुका है। उन सिलसिलों में बन्दे ने ई़द मीलादुन्नबी ﷺ के बिदअ़त और नाजायज़ होने से मुताल्लिक़ भी तफ्सील ज़िक्र की है।
अलबत्ता ज़ेर-ए-नज़र तहरीर में जश्न-ए-ईद मीलादुन्नबी ﷺ के बिदअत होने से मुताल्लिक़ एक शुब्ह का इज़ाला (और एक ऐतिराज़ का जवाब) मक़सूद है, और इसी के साथ-साथ बिदअत की हक़ीक़त, मज़म्मत और अक़्साम वग़ैरह से मुताल्लिक़ भी तफ्सीलात ज़िक्र की जा रही हैं ताकि बिदअ़त की हक़ीक़त वाज़ेह होने के साथ-साथ जश्न-ए-ईद मीलादुन्नबी ﷺ जैसी बिदआ़त की तर्दीद भी हो सके। गोया कि यह सिलसिला नंबर 400, मज़कूरा रिसाले के मज़ामीन में मज़ीद इज़ाफ़े के तौर पर तहरीर किया जा रहा है।
📿 बिदअ़त की हक़ीक़त:
लुग़त (शब्दों का अर्थ) में बिदअ़त हर नई चीज़ को कहते हैं चाहे उसका तअल्लुक़ दीन के साथ हो या दुनिया के साथ, और चाहे इ़बादात के साथ हो या आ़दात के साथ।
जबकि शरीअत की इस्तिलाह में बिदअत के मानी हैं: दीन में सवाब की नियत से किसी ऐसे नए काम को ईजाद करना कि जो हुज़ूर अक़्दस ﷺ और हज़रात-ए-सहाबा के दौर में न हो और असबाब पाए जाने के बावजूद भी उसे इख़्तियार न किया गया हो, उसे बिदअत कहते हैं।
इससे मालूम हुआ कि दुनियावी ईजादात को बिदअत नहीं कहा जा सकता क्योंकि बिदअत उस अमल को कहा जाता है जो दीन में इजाद किया जाए।
📿 इहदास लिद्दीन और इहदास फ़िद्दीन की हक़ीक़त:
इहदास फ़िद्दीन का मतलब है: दीन में कोई नया काम ईजाद करना। जबकि इहदास लिद्दीन का मतलब है: दीन के लिए कोई नया काम ईजाद करना।
दीन में कोई नया काम ईजाद करने को इहदास फ़िद्दीन भी कहते हैं, और यही बिदअत है। इहदास फ़िद्दीन यानी दीन में कोई नया काम ईजाद करने का मतलब ये है कि उसको बराहे रास्त फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत या मुस्तहब का दर्ज़ा दिया जाए, उसको मक़सूद क़रार दिया जाए, उसको अपनी ज़ात में इबादत समझा जाए, और उसको छोड़ने वाले पर वही हुक्म लगाया जाए जो कि फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत या मुस्तहब या किसी इबादत के छोड़ने पर लगाया जाता है।
जबकि इहदास लिद्दीन का मतलब ये है कि उसको बराहे रास्त फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत या मुस्तहब का दर्ज़ा नहीं दिया जाता, उसको मक़सूद क़रार नहीं दिया जाता, उसको अपनी ज़ात में इबादत नहीं समझा जाता, और उसको छोड़ने वाले पर वो हुक्म हरगिज़ नहीं लगाया जा सकता जो कि फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत या मुस्तहब या किसी इबादत के छोड़ने पर लगाया जाता है। इस से इहदास फ़िद्दीन और लिद्दीन की हक़ीक़त मालूम हो जाती है।
📿 तब्लीगी जमाअत के सहरोज़ा और चिल्ला वग़ैरह से मुतअल्लिक़ एक शुब्ह का जवाब:
इहदास लिद्दीन और इहदास फ़िद्दीन से मुतअल्लिक़ माक़बल (और ऊपर) की तफ़सील से उन हज़रात का भी जवाब हो जाता है जो कहते हैं कि अगर जश्न-ए-ईद मीलादुन्नबी ﷺ बिदअत है तो फिर तब्लीगी जमाअत का सहरोज़ा, चिल्ला और चार माह वग़ैरह भी बिदअत होने चाहिएँ।
➡️ जवाब ये है कि तब्लीगी जमाअत का सहरोज़ा, चिल्ला वग़ैरह बिदअत नहीं हैं, क्यों कि ये उमूर अपनी ज़ात में मक़सूद और इबादत नहीं हैं बल्कि अस्ल मक़सूद और इबादत तो दीन सीखना-सिखाना और दावत-व-तब्लीग़ है जिसका क़ुरआन-व-सुन्नत से वाज़ेह सुबूत है। इसी तरह ये उमूर ज़रूरी नहीं समझे जाते बल्कि जो ज़रूरी है वो दीन सीखना और अपनी इस्तिताअत के मुताबिक़ दूसरों तक पहुँचाना है, जिसकी अहमियत और सराहत क़ुरआन-ओ-सुन्नत में मौजूद है।
सहरोज़ा, चिल्ला वग़ैरह की हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी है कि दीन सीखने और उसकी इशाअत के लिए बुज़ुर्गान-ए-दीन का क़ायम किया हुआ एक बेहतरीन मुनज़्ज़म इंतिज़ाम है, जिसकी अहमियत व इफ़ादियत सब पर वाज़ेह है, और इस निज़ाम में तबदीलियाँ होती रही हैं और होती रहेंगी। गोया कि ये दीन के लिए ईजाद हैं, दीन में ईजाद नहीं हैं।
जबकि जश्न-ए-मीलादुन्नबी ﷺ जैसे उमूर तो बराहे रास्त दीन समझे जाते हैं, इबादत समझे जाते हैं, बल्कि इश्क़-ए-रिसालत और दीनदारी का मैयार क़रार दिए जाते हैं, न करने वाले को मलामत और ताने दिए जाते हैं और उनके ख़िलाफ़ परोपेगंडा किया जाता है। ये सब इस बात की दलील है कि ये दीन में ईजाद किया हुआ काम है, न कि दीन के लिए ईजाद।
▪ चुनाँचे मुफ़्ती आज़म पा-किस्ता-न मुफ़्ती शफ़ी साहिब रहिमहुल्लाह बिदअत की हक़ीक़त वाज़ेह करते हुए फ़रमाते हैं:
📿 बिदअत की तअरीफ़ और उसकी हक़ीक़त:
अस्ल लुग़त (शब्दों का अर्थ) में बिदअत हर नई चीज़ को कहते हैं, ख़्वाह इबादात से मुतअल्लिक़ हो या आदात से, और इस्तिलाह-ए-शरअ में हर ऐसे नो ईजाद तरीक़-ए-इ़बादत को बिदअत कहते हैं जो ज़्यादा सवाब हासिल करने की नियत से रसूलुल्लाह ﷺ और ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन के बाद इख़्तियार किया गया हो, और आंह़ज़रत ﷺ और सहाबा किराम के अह्द-ए-मुबारक में उसका दाइया और सबब मौजूद होने के बावजूद न क़ौलन (बयान से) साबित हो न फ़े‘लन (न अ़मल से), न सराहतन न इशारतन। बिदअत की ये तअरीफ़ अ़ल्लामा बरकवी की किताब अत्तरीक़तुल मुहम्मदिय्यह और अ़ल्लामा शातिबी की किताब अलइ'तिसाम से ली गई है।
इस तअरीफ़ से मालूम हुआ कि आदात और दुनियवी ज़रूरतों के लिए जो नए नए आलात और तरीक़े रोज़ मर्रा इजाद होते रहते हैं उनका शरई बिदअत से कोई तअल्लुक़ नहीं, क्यों कि वो बतौर-ए-इबादत और ब-नियत-ए-सवाब नहीं किए जाते, ये सब जाइज़ और मुबाह हैं, बशर्ते कि वो किसी शरई हुक्म के मुख़ालिफ़ न हों। नीज़ ये भी मालूम हो गया कि जो इ़बादत आंह़ज़रत ﷺ या सहाबा किराम से क़ौलन साबित हो या फ़े‘लन, (बयान से साबित हो या अ़मल से) सराहतन या इशारतन; वो भी बिदअत नहीं हो सकती।
नीज़ ये भी मालूम हो गया कि जिस काम की ज़रूरत अ़ह्द-ए-रिसालत (ह़ुज़ूर के ज़माने) में मौजूद न थी, बाद में किसी दीनी मक़सद को हासिल करने के लिए पैदा हो गई, वो भी बिदअत में दाख़िल नहीं, जैसे मुरव्वजा (राइज) मदारिस-ए-इस्लामिय्यह और तालीमी तब्लीगी अंजुमनें और दीनी नशर-व-इशाअत के इदारे और क़ुरआन-व-हदीस समझने के लिए सरफ़-ओ-नह्व और अदब-ए-अरबी और फ़साहत-ओ-बलागत के फ़ुनून, या मुख़ालिफ़-ए-इस्लाम फ़िर्क़ों का रद्द करने के लिए मंतिक़ और फ़ल्सफ़ा की किताबें या जिहाद के लिए जदीद असलिहा और जदीद तरीक़-ए-जंग की तालीम वग़ैरह।
📿 इहदास फ़ि-द-दीन और इहदास लिद-दीन की तफ़सील:
इसको यूँ भी कहा जा सकता है कि ये सब चीज़ें न अपनी ज़ात में इबादत हैं, न कोई इनको इस ख़याल से करता है कि इनमें ज़्यादा सवाब मिलेगा, बल्कि वो चीज़ें इबादत का ज़रिया और मुक़द्दमा होने की हैसियत से इबादत कहलाती हैं। गोया ये इहदास फ़ि-द-दीन नहीं बल्कि इहदास लिद-दीन है। और अहादीस में मुमानअ़त इहदास फ़ि-द-दीन (दीन में कोई नया काम ईजाद करने) की आयी है, इहदास लिद-दीन (दीन के लिए कोई नया काम ईजाद करने) की नहीं। यानी किसी मनसू़स दीनी मक़सद को पूरा करने के लिए ब-ज़रूरत-ए-ज़मान व मक़ान कोई नयी सूरत इख़्तियार कर लेना ममनूअ नहीं।
इस तफ़सील से ये भी मालूम हो गया कि जिन कामों की ज़रूरत अह्द-ए-रिसालत (ह़ुज़ूर के ज़माने) में और ज़मान-ए-मा-बअद में यक़साँ (एक जैसी) है, उनमें कोई ऐसा तरीक़ा ईजाद करना जो आंह़ज़रत ﷺ और सहाबा-ए-किराम से साबित नहीं — उसको बिदअत कहा जाएगा और ये अज़-रू-ए-क़ुरआन व हदीस ममनूअ व नाजायज़ होगा।
मसलन: दरूद व सलाम के वक़्त खड़े होकर पढ़ने की पाबंदी, फ़ुक़रा को खाना खिला कर ईसाल-ए-सवाब करने के लिए खाने पर मुख़्तलिफ़ सूरतेँ पढ़ने की पाबंदी, नमाज़ बाजमाअत के बाद पूरी जमाअत के साथ कई कई मर्तबा दुआ माँगने की पाबंदी, ईसाल-ए-सवाब के लिए तीज़ा, चहल्लुम वग़ैरह की पाबंदी, रजब-व-शअबान वग़ैरह की मुतबर्रिक रातों में ख़ुद ईजाद क़िस्म की नमाज़ें और उनके लिए चराग़ाँ वग़ैरह, और फिर उन ख़ुद ईजाद चीज़ों को फ़र्ज़-व-वाजिब की तरह समझना, उनमें शरीक न होने वालों पर मलामत और लअन-व-तअन करना वग़ैरह।
ज़ाहिर है कि दरूद व सलाम, सदक़ा व ख़ैरात, अम्वात को ईसाल-ए-सवाब, मुतबर्रिक रातों में नमाज़ व इबादत, नमाज़ों के बाद दुआ — ये सब चीज़ें इ़बादात हैं। इनकी ज़रूरत जैसे आज है वैसे ही अह्द-ए-सहाबा में भी थी। इनके ज़रिया सवाब-ए-आख़िरत और रज़ा-ए-इलाही हासिल करने का ज़ौक़ व शौक़ जैसे आज किसी नेक बन्दे को हो सकता है, रसूल करीम ﷺ और आपके सहाबा-ए-किराम को उन सबसे ज़्यादा था। कौन दावा कर सकता है कि उसको सहाबा-ए-किराम से ज़्यादा ज़ौक़-ए-इबादत और शौक़-ए-रज़ा-ए-इलाही हासिल है??
हज़रत हुज़ैफ़ा बिन यमान (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) फ़रमाते हैं:
كُلُّ عِبَادَةٍ لَمْ يَتَعَبَّدْهَا أَصْحَابُ رَسُولِ اللهِ ﷺ فَلَا تَعَبَّدُوهَا؛ فَإِنَّ الْأَوَّلَ لَمْ يَدَعْ لِلْآخِرِ مَقَالًا، فَاتَّقُوا اللهَ يَا مَعْشَرَ الْقُرَّاءِ، وَخُذُوا بِطَرِيقِ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ، وَنَحْوِهُ لِابْنِ مَسْعُودٍ أَيْضًا۔
यानी: जो इबादत सहाबा-ए-किराम ने नहीं की वो इबादत न करो, क्योंकि पहले लोगों ने पिच्छलों के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जिसे वो पूरा करें। ऐ मुसलमानो! ख़ुदा तआला से डरो और पहले लोगों के तरीक़े को इख़्तियार करो।
इसी मज़मून की रिवायत हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊ़द (रज़ियल्लाहु अन्हु) से भी मंक़ूल है। (जवाहरुल फ़िक़्ह 1/458)
📿 बिदअत-ए-हसना और सय्यि'अह की हक़ीक़त:
बहुत से हज़रात जशन-ए-ईद मिलादुन्नबी ﷺ को जवाज़ फ़राहम (जाइज़) करने के लिए ये कहते हुए नज़र आते हैं कि बिदअत की दो क़िस्में हैं:
❶ बिदअत-ए-सय्यि'अह (बुरी बिदअत)
❷ बिदअत-ए-हसना (अच्छी बिदअत)
चूँकि हम सवाब ही का काम कर रहे हैं, तो ये बिदअत-ए-हसना है, इसलिए ये जाइज़ है।
ये वाज़ेह ग़लतफ़हमी है, क्योंकि लुग़त (शब्दों का अर्थ) के एतिबार से बिदअत का मफ़हूम आम है कि हर नयी चीज़ को बिदअत कहते हैं — चाहे अच्छी हो या बुरी। लेकिन शरीअत की नज़र में जिन चीज़ों को बिदअत कहा जाता है, उनमें से कोई भी चीज़ अच्छी नहीं होती बल्कि सब बुरी होती हैं। इसलिए बिदअत-ए-हसना और बिदअत-ए-सय्यि'अह की तक़सीम लुग़त के एतिबार से तो दुरुस्त हो सकती है, लेकिन शरीअत की नज़र में हरगिज़ दुरुस्त नहीं हो सकती।
इससे मालूम हुआ कि तरावीह की जमाअत से मुतअल्लिक़ हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का ये फ़रमान कि: نِعْمَتِ الْبِدْعَةُ هَذِهِ यानी "ये बिदअत तो अच्छी है" — ये लुग़त के एतिबार से था, न कि शरीअत के एतिबार से।
➡️ चनांचे मुफ़्ती आज़म पा-किस्ता-न मुफ़्ती शफ़ी साहब रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:
’’सहीह हदीस में है: كُلُّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ، وَكُلُّ ضَلَالَةٍ فِي النَّارِ, यानी हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम में है। इस से मालूम हुआ कि इस्तिलाहे शरअ में हर बिदअत सय्यि'अह और गुमराही है, किसी बिदअते इस्तिलाही को बिदअते हसना नहीं कहा जा सकता, अलबत्ता लुग़वी मअ़ना में हर नई चीज़ को बिदअत कहते हैं, इस एतिबार से ऐसी चीज़ों को बिदअते हसना कह देते हैं जो सरीह तौर पर आंह़ज़रत ﷺ के अ़हद (ज़माना) मुबारक़ में नहीं थीं, बाद में किसी ज़रूरत की बुनियाद पर उनको इख़्तियार किया गया, जैसे आजकल के मदारिसे इस्लामिया और उन में पढ़ाए जाने वाले उलूम व फ़ुनून कि दरअसल बुनियाद तालीम और दरस और मदरसा की तो आंह़ज़रत ﷺ से साबित है, आपने ख़ुद फ़रमाया: ’’اِنَّمَا بُعِثْتُ مُعَلِّمًا‘‘ यानी मैं तो मुअल्लिम बना कर भेजा गया हूँ, लेकिन जिस तरह के मदरसों का क़ियाम और उन में जिस तरह की तालीम आजकल ब-ज़रूरत ज़माना ज़रूरी हो गई, आंह़ज़रत ﷺ और सहाबा कराम के अहद में इस की ज़रूरत न थी, आज ज़रूरत पेश आई तो इहयाए सुन्नत के लिए इस को इख़्तियार किया गया, जो ता‘रीफ़ बिदअत की ऊपर लिखी जा चुकी है उस की रू से ऐसे आमाल बिदअत में दाख़िल नहीं, लेकिन लुग़वी मअ़ना के एतिबार से कोई इनको बिदअत कह दे तो बिदअते हसना ही कहा जाएगा। हज़रत फ़ारूक़ आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु ने तरावीह की यकजा जमाअत को देख कर इस मअ़ना के एतिबार से फ़रमाया: نِعْمَتِ الْبِدْعَةُ هَذِهِ, यानी ये बिदअत तो अच्छी है, क्यूँकि इनको और सबको मालूम था कि तरावीह रसूलुल्लाह ﷺ ने ख़ुद पढ़ी और पढ़ाई और ज़बानी इस की ताक़ीद की, इस लिए हक़ीक़तन और शरअन तो इस में बिदअत का कोई एहतिमाल न था, अलबत्ता आंह़ज़रत ﷺ के अहद मुबारक़ में एक ख़ास उ़ज़र की वजह से तरावीह की जमाअत का ऐसा एहतिमाम न किया गया था जो बाद में हुज़ूर ही की तालीम के मुताबिक़ किया गया, इस लिए ज़ाहिरी और लुग़वी तौर पर ये काम भी नया था, इस को نِعْمَتِ الْبِدْعَةُ फ़रमाया। बिदअते हसना का इस से ज़्यादा कोई तसव्वुर इस्लाम में नहीं है। हज़रत इमाम मालिक रहमतुल्लाहि अ़लैह ने फ़रमाया:
مَنْ أَحْدَثَ فِي هَذِهِ الْأُمَّةِ شَيْئًا لَمْ يَكُنْ عَلَيْهِ سَلَفُهَا فَقَدْ زَعَمَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ ﷺ خَانَ الرِّسَالَةَ؛ لِأَنَّ اللهَ يَقُولُ: الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا۔ [المائدة: 3]، فَمَا لَمْ يَكُنْ يَوْمَئِذٍ دِينًا فَلَا يَكُونُ الْيَوْمَ دِينًا. (اعتصام 1/ 48)
फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के इर्शाद या बाज़ बुज़ुर्गों के ऐसे कलिमात की आड़ ले कर तरह तरह की बिदअतें बिदअते हसना के नाम से इजाद करने वालों के लिए इस में कोई वजह-ए-जवाज़ (जाइज़ होने की वजह) नहीं है, बल्कि जो चीज़ इस्तिलाहे शरअ में बिदअत है वो मुतलक़न ममनूअ व नाजायज़ है। अलबत्ता बिदअतों में फिर कुछ दर्ज़ात हैं, बाज़ सख़्त हराम क़रीब शिर्क के हैं, बाज़ मक़रूह तहरीमी, बाज़ तनज़ीही।‘‘ (जवाहरुल फ़िक़्ह 6/465)
❄️ वज़ाहत: मुफ़्ती आज़म पा-किस्ता-न मुफ़्ती शफ़ी साहब रहमतुल्लाहि अ़लैह के ह़वाले से जो बातें ज़िक्र की गईं ये उन्हीं के इफ़ादात पर मुश्तमिल किताब "दीन व शरीअत की बुनियादें और फ़िक़ही उसूल व ज़ाबिते कुरआन की रौशनी में" से ली गई हैं, जिस के मुर्त्तिब हज़रत मौलाना मुहम्मद ज़ैद नदवी साहब दाम ज़िल्लहुम हैं।
📿 बिदअत की मज़म्मत:
अहा़दीस में बिदअत की सख़्त मज़म्मत (बुराई) आई है, ज़ैल में उस से मुतअल्लिक़ तीन रिवायतें मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
❶ हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं कि हुज़ूर अकदस ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया: ’’जिस ने हमारे दीन में कोई नई बात ईजाद की तो वो (नई बात) मर्दूद (यानि नाक़ाबिले एतिबार और क़ाबिले रद्द) है।‘‘
☀ सहीह-अल-बुख़ारी में है:
2697- عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللّٰہ عَنْهَا قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللّٰہ ﷺ: «مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ فِيهِ فَهُوَ رَدٌّ».
❷ हुज़ूर अकदस ﷺ ने फ़रमाया: ’’जिस ने दीन में कोई बिदअत ईजाद की या किसी बिदअती को ठिकाना दिया तो उस पर अल्लाह की लानत हो, फ़रिश्तों की लानत हो और तमाम इंसानों की लानत हो।‘‘
☀ सुनन अबी दाऊद में है:
4532- مَنْ أَحْدَثَ حَدَثًا أَوْ آوَى مُحْدِثًا فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ.
❸ हज़रत इ़रबाज़ बिन सारियह रज़ियल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि हुज़ूर अकदस ﷺ ने फ़रमाया: ’’तुम में से जो लोग मेरे बाद ज़िन्दा रहेंगे वो बहुत इख़्तिलाफ़ात देखेंगे, इस लिए (मैं तुम्हें वसिय्यत करता हूँ क( तुम मेरी सुन्नत और खुलफ़ाए राशिदीन की सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहना और उसी के मुताबिक़ हर काम में अमल करना, नए नए तरीक़ों से बचते रहना, क्यूँकि दीन में नई पैदा की हुई हर चीज़ बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है।‘‘
☀ सुनन अबी दाऊद में है:
4609- حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ: حَدَّثَنَا الْوَلِيدُ بْنُ مُسْلِمٍ: حَدَّثَنَا ثَوْرُ بْنُ يَزِيدَ قَالَ: حَدَّثَنِى خَالِدُ بْنُ مَعْدَانَ قَالَ: حَدَّثَنِى عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَمْرٍو السُّلَمِىُّ وَحُجْرُ بْنُ حُجْرٍ قَالا: أَتَيْنَا الْعِرْبَاضَ بْنَ سَارِيَةَ ... وَإِيَّاكُمْ وَمُحْدَثَاتِ الأُمُورِ؛ فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلاَلَةٌ».
➡️ वाज़ेह रहे कि बिदअत की मज़म्मत और क़बाहत (बुराई) का अंदाज़ा इस से भी लगाया जा सकता है कि:
▪ बिदअत एक संगीन गुनाह है।
▪ बिदअत दीन-ए-इस्लाम के मद्दे-मुक़ाबिल एक ख़ुद-साख़्ता मुतवाज़ी दीन है।
▪ बिदअत दीन-ए-इस्लाम पर एक बहुतान भी है कि बिदअत की सूरत में दीन की तरफ़ वो बात मंसूब की जा रही है जो कि दीन है ही नहीं।
▪ बिदअत सुन्नत का मुक़ाबला भी है कि हुज़ूर अकदस ﷺ ने तो सुन्नत पर अमल करने की ताक़ीद फ़रमाई है जबकि बिदअत का मुर्तकिब सुन्नत को तरक कर के बिदअत पर अमल-पैरा रहता है।
▪ बिदअत दीन में तहरीफ़ का रास्ता खोल देती है जिस से रफ़्ता-रफ़्ता दीन का हुलिया मस्ख़ हो जाता है। (दीन की सूरत बदल जाती है)
▪ बिदअत सहाबा पर अदमे-ए-एतिमाद (और उन पर भरोसा न करना) है कि गोया उन्होंने हम तक मुकम्मल दीन नहीं पहुँचाया। मा'आज़ अल्लाह।
📿 बिदअ़त की मज़म्मत से मुतअल्लिक़ इमाम मालिक रहमतुल्लाहि अ़लैह का एहम तरीन इर्शाद:
हज़रत इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि: जिस शख़्स ने दीन में कोई नई बिदअत ईजाद की और उसको अच्छा समझा तो उस ने ये गुमान किया कि .. मा'आज़ अल्लाह .. हुज़ूर अकदस ﷺ ने रिसालत में ख़यानत की, क्यूँकि अल्लाह तआ़ला फ़रमाता है कि: ’’आज के दिन मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया है।‘‘ तो जो बात उस वक़्त दीन न थी वो आज भी दीन नहीं हो सकती।
☀ الاعتصام للشاطبي में है:
قَالَ ابْنُ الْمَاجِشُونِ: سَمِعْتُ مَالِكًا يَقُولُ: مَنِ ابْتَدَعَ فِي الْإِسْلَامِ بِدْعَةً ... فَمَا لَمْ يَكُنْ يَوْمَئِذٍ دِينًا فَلَا يَكُونُ الْيَوْمَ دِينًا.
📿 बिदअ़त की अक़्साम:
बिदअ़त की दो क़िस्में हैं:
❶ बिदअत फ़िल अक़ीदा: यानी इस्लाम और अहलुस्सुन्नत वल जमाअत के मुख़ालिफ़ कोई नया अक़ीदा ईजाद करना।
❷ बिदअत फ़िल अ़मल: यानी दीन में कोई नया अमल इजाद करना।
फिर हुक्म के एतिबार से बिदअत की मुख़्तलिफ़ क़िस्में हैं, कभी तो कुफ़्र तक ले जाती है, कभी इस्लाम से तो बाहर नहीं करती अलबत्ता अहलुस्सुन्नत वल जमाअत से निकाल कर गुमराह कर देती है, और कभी वो बिदअत फ़ासिक़ (और गुनहगार) बना देती है।
📿 बिदअत की सूरतें:
माक़बल की तफ़सील से मालूम हुआ कि दीन में कोई नयी बात ईजाद करने को बिदअत कहते हैं, ये बिदअत चाहे अकीदे की सूरत में हो या अमल की सूरत में। ज़ैल में (नीचे) इसकी मजी़द तफ़सील बयान की जाती है ताकि इसकी मुतअद्दिद (कई) सूरतें सामने आ जाएँ और बिदअत की हक़ीक़त वाज़ेह हो सके:
❶ दीन में इस्लाम या अहलुस्सुन्नत वलजमाअत के मुख़ालिफ़ कोई अकीदा ईजाद करना बिदअत है।
❷ दीन में कोई नयी इबादत ईजाद करना बिदअत है, जैसे ईसाल-ए-सवाब के नाम पर मुरव्वजा (राइज) इज्तिमाई क़ुरआन ख्वानी, जश्न-ए-ईद मीलादुन-नबी ﷺ, अज़ान से पहले मुरव्वजा दरूद व सलाम कहना।
❸ शरीअत ने जिस अमल को आम रखा हो उसको ख़ास करना बिदअत है जैसे शरीअत में ईसाल-ए-सवाब के लिए कोई अमल मख़सूस नहीं, बल्कि हर नेक अमल का ईसाल-ए-सवाब किया जा सकता है, लेकिन आजकल बहुत से लोगों ने इसको सिर्फ़ देगें पकाने या इज्तिमाई क़ुरआन ख्वानी वग़ैरह के साथ ख़ास कर रखा है, यहाँ तक कि उनको लाज़िम भी समझते हैं।
❹ शरीअत ने जिस अमल को किसी दिन के साथ ख़ास नहीं किया बल्कि उसको आम रखा हो उसको किसी दिन के साथ ख़ास करना बिदअत है, जैसे शरीअत में ईसाल-ए-सवाब के लिए कोई दिन मख़सूस नहीं, बल्कि साल भर में किसी भी दिन ईसाल-ए-सवाब किया जा सकता है, लेकिन आजकल बहुत से लोगों ने उसको सुऐम, तीसरा, जुमआ, चालिसवाँ और बरसी या मुहर्रम, रजब वग़ैरह के साथ ख़ास कर रखा है और उसका एहतमाम भी हर सूरत किया जाता है और जो उसको ग़लत कहे उस पर तअन् व मलामत की जाती है। इसी तरह ह़ुज़ूर-ए-अक़्दस ﷺ के ज़िक्र-ए-मुबारक को माह-ए-रबीउल अव्वल के साथ ख़ास करना।
❺ शरीअ़त ने जिस अमल का जो दर्जा मुक़र्रर कर रखा है उसको उस दर्जे से बढ़ाना या घटाना बिदअत है, जैसे मुस्तहब अमल को वाजिब क़रार देना बिदअत है, या वाजिब अमल को मुस्तहब क़रार देना बिदअत है, या जाइज़ अमल को लाज़िम क़रार देना बिदअत है। इसकी बहुत सी मिसालें हैं।
❻ शरीअत ने जो अमल इनफ़िरादी मुक़र्रर किया हो उसके लिए इज्तिमाइयत का एहतमाम और इल्तिज़ाम बिदअत है, जैसे चाश्त की नमाज़ के लिए मस्जिद में जमाअत की अदाइगी का एहतमाम बिदअत है।
📿 बिदअ़त के अस्बाब:
बिदअत ईजाद करने के मुतअद्दिद अस्बाब और वुजूहात (कई वजहें) होती हैं जैसे:
▪ शरीअत की तालीमात से नावाक़फ़ियत और जहालत।
▪ ख़्वाहिशात की इति़बा।
▪ क़ौमी, इलाक़ाई, जमाअती या फ़िर्क़ावाराना तअस्सुब और ज़िद्द।
▪ कुफ़्फ़ार की मुशाबहत।
📿 बिदअ़तों और रुसूमात की आलूदगी से मुतअस्सिर होने वाली कुछ इ़बादात:
ज़ैल में बतौर-ए-मिसाल कुछ ऐसी इबादात और नेकियों का ज़िक्र किया जाता है जिनमें बहुत सी बिदअतें और ग़ैर-शरई बातें आ चुकी हैं, जिसकी वजह से ये अहम इबादात अल्लाह तआला की नाराज़गी का ज़रिया बन जाती हैं:
▪ तअ़ज़ियत जैसी अहम इ़बादत में शामिल होने वाली बिदअतें व रसूमात।
▪ मय्यित के लवाहिक़ीन के लिए खाना भेजने में शामिल होने वाली बिदअतें व रसूमात।
▪ ईसाल-ए-सवाब के नाम पर राइज़ होने वाली बिदअतें।
▪ सदक़ा जैसी अहम इबादत में राइज़ होने वाली बिदअतें।
▪ ज़िक्र और दरूद व सलाम में शामिल होने वाली बिदअतें व रसूमात।
▪ ह़ुज़ूर-ए-अक़्दस ﷺ के ज़िक्र-ए-मुबारक के नाम पर राइज़ होने वाली बिदअतें व रसूमात।
▪ ह़ज और उमरा में सर-अंजाम दिए जाने वाले ख़ुद-साख़्ता तरीक़े।
▪ मय्यित के कफ़न-दफ़न में सर-अंजाम दी जाने वाली ग़ैर-शरई बातें।
▪ नअत-ख़्वानी में शामिल होने वाली ख़ुराफ़ात।
अल्ग़र्ज़, लोगों ने बहुत सी इबादात में अपनी तरफ़ से बिदअतें व रसूमात दाख़िल कर दी हैं, बल्कि इबादत के नाम पर बहुत सी बिदअतें व रसूमात इजाद कर ली हैं। इस लिए नेक़ी भी करते हैं तो वो भी ख़ुदा को नाराज़ करके, गोया कि जो नेक़ी अल्लाह को राज़ी करने के लिए थी आज शरीअत की तालीमात के मुताबिक़ अंजाम न देने की वजह से वही नेक़ी अल्लाह की नाराज़गी का ज़रिया बन जाती है।
📿 बिदअ़त के नुक़्सानात:
बिदअत के बहुत से नुक़्सानात हैं जैसे:
▪ शरीअत की ख़िलाफ़-वरज़ी।
▪ सुन्नत तरीक़े को तरक करना (छोड़ना)।
▪ बिदअतों व रसूमात को क़ुव्वत (मज़बूती) पहुँचाना।
▪ माल का ज़ियाअ (बर्बादी)।
▪ गुनाह का इर्तिकाब।
▪ अल्लाह तआला की नाराज़गी।
▪ उस अमल का बे-फ़ायदा होना, बल्कि सवाब की बजाए गुनाह मिलना।
✍🏻 … मुफ़्ती मुबीनुर्रहमान साहिब मदज़िल्लह
फ़ाज़िल जामिआ दारुल उलूम कराची
हिंदी तर्जुमा व तसहील:
अल्तमश आ़लम क़ासमी

0 टिप्पणियाँ