जिन हज़रात को कल ग़ज़्ज़ा वाले मसले पर सवालात हुए, वे अब्दुल्लाह मुमताज़ साहब की यह पोस्ट ज़रूर पढ़ लें। बहुत मुफ़ीद है।
-------
सवाल:
ख़ुदा ख़ालिक़-ए-कायनात है और ग़फ़ूर-रहीम भी।
फिर ग़ज़्ज़ा में बच्चों का क़त्ल-ए-आम और मासूमों का जेनोसाइड क्यों होने देता है?
जवाब:
ख़ुदा ने इंसानों को “इख़्तियार” दे रखा है कि वे ज़ुल्म करें या अद्ल,
सफ़ाक़त का मुज़ाहरा करें या रहम और इंसानियत का —
यही तो तक़ाज़ा-ए-इम्तिहान है।
अगर हाथ बाँध कर इम्तिहान लिया जाए,
यानि एक इंसान ज़ुल्म तो करना चाहता है
लेकिन ख़ुदा उसका हाथ पकड़ ले कि ऐसा होने नहीं देंगे,
वह बच्चों को मारना तो चाहता है
लेकिन ख़ुदा उसका यह इख़्तियार सलब कर ले —
तो फिर यह इम्तिहान कहाँ हुआ?
इम्तिहान तो तब है
जब इंसान को सही और ग़लत करने का पूरा इख़्तियार हो,
और उससे भी बड़ा इम्तिहान यह है कि
सही और ग़लत करने का इख़्तियार ही नहीं
बल्कि सही और ग़लत का इल्म भी हो,
इसके बावजूद आदमी ग़लत को इख़्तियार करे।
ख़ुदा ने यही किया है कि
इंसानों को सही और ग़लत का इल्म भी दे रखा है
और सही और ग़लत करने का इख़्तियार भी दे रखा है।
सवाल:
अगर नेतन्याहू और ट्रम्प अपने “इख़्तियार” का इस्तेमाल करके
ग़ज़्ज़ा में बच्चों को मार रहे हैं
और ख़ुदा उन बच्चों को नहीं बचाता —
और यह उनके इम्तिहान का हिस्सा है,
तो फिर हमें भी उनके “इख़्तियार” में आड़े नहीं आना चाहिए?
और हमें भी उन बच्चों को बचाने की जद्दोजहद नहीं करनी चाहिए?
जवाब:
जिस तरह ख़ुदा ने नेतन्याहू और ट्रम्प को
इंसानियत और इंसानियत को रौंदने का “इख़्तियार” दे रखा है —
क्योंकि यह दारुल-इम्तिहान है —
उसी तरह यह तमाम इंसानों के लिए भी दारुल-इम्तिहान है।
हमें भी “इख़्तियार” दे रखा है कि
हम उन बच्चों को बचाने के लिए जद्दोजहद करें,
या ख़ामोश रहें,
या फिर इस्राईल का सपोर्ट ही करें।
जो जिस दर्जे में उन बच्चों को बचाने की कोशिश करता है और करता रहेगा,
ख़ुदा उसे अज्र अता करेगा।
और जो ख़ामोश रहता है,
या ऐसे लोग भी हैं जो ग़ज़्ज़ा के क़त्ल में सीधे शरीक तो नहीं,
लेकिन अपने “इख़्तियार” का इस्तेमाल करके
उन मासूम बच्चों के क़त्ल पर ख़ुश होते हैं,
उनका मज़ाक़ उड़ाते हैं —
ख़ुदा उन्हें सज़ा देगा।
सवाल:
किसी के इम्तिहान के चक्कर में
हज़ारों बच्चे कुचल दिए जाएँ,
लाखों इंसानों के परख़चे उड़ा दिए जाएँ —
यह कहाँ का इंसाफ़ है?
जवाब:
ख़ुदा ने एक निज़ाम बनाया है
और सारी मख़लूक़ात को उसके ताबे किया है।
यानि ख़ुदा चाहे तो
बिना बाप के भी बच्चे पैदा कर सकता है,
ख़ुदा चाहे तो
बिना मौसम और बिना दरख़्तों के भी फल पैदा कर सकता है।
लेकिन मख़लूक़ात इस निज़ाम के ताबे हैं कि
स्पर्म का अंडे से मिलाप होगा,
तभी बच्चे पैदा होंगे।
मिट्टी, पानी और हवा होगी,
तभी दरख़्त उगेगा और फल लगेगा।
इसी तरह ख़ुदा ने
ज़ुल्म और हिफ़ाज़त के लिए ताक़त का निज़ाम बनाया है।
जिसके पास ताक़त होगी,
वह अपना हिफ़ाज़त भी कर सकता है
और दूसरों पर ज़ुल्म भी।
जिस तरह इस्राईल और अमरीका को
अल्लाह तआला ने ताक़त पैदा करने
और उसके सही और ग़लत इस्तेमाल का इख़्तियार दिया था,
उसी तरह दुनिया के हर मुल्क को
ताक़त पैदा करने और
उससे अपना हिफ़ाज़त करने
और दूसरों पर ज़ुल्म करने का इख़्तियार दिया है।
बल्कि अल्लाह तआला ने
मुसलमानों को भी ताक़त पैदा करने का हुक्म दिया था,
लेकिन अफ़सोस
मुसलमानों ने इस निज़ाम का हिस्सा बनने के बजाय
ताक़तवरों पर भरोसा किया।
यानि ज़मीन भी दी गई थी,
बारिश भी हुई थी,
फ़सल बोने का बेहतरीन मौसम भी मौजूद था,
और अल्लाह ने फ़सल बोने का हुक्म भी दिया था —
लेकिन मुसलमानों ने फ़सल बोने के बजाय
उन ज़मींदारों और साहूकारों पर भरोसा किया
जिनके पास ढेर सारा अनाज था
और जिन्होंने वादा किया था कि
जब ज़रूरत होगी हम अनाज दे देंगे।
अब जब वही साहूकार और ज़मींदार
उन्हें भूखा रखने पर मजबूर कर रहे हैं
और उनकी भूख का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं,
तो इसमें ख़ुदा का कोई क़ुसूर नहीं।
हमने चूँकि निज़ाम को फ़ॉलो नहीं किया,
इसलिए ग़ज़्ज़ावी बच्चे मारे जा रहे हैं।
हाँ, लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं
कि ज़ालिम को कोई जायज़ ठहराया जा रहा है —
उनसे तो ज़रूर हिसाब होगा,
क्योंकि उन्होंने अपने “इख़्तियार” का ग़लत इस्तेमाल किया है।
यह बस उस सवाल का जवाब है
कि जो आप कोटे जा रहे हैं,
वह सिर्फ़ किसी के इम्तिहान की वजह से नहीं,
बल्कि अपने आमाल की वजह से है।
और आमाल से मुराद
“नमाज़-रोज़े वाले आमाल नहीं”
बल्कि ताक़त में पीछे रह जाने वाला अमल है।
सवाल:
जब सब कुछ का इख़्तियार इंसानों के हाथ में है
और दुनिया दारुल-इम्तिहान है,
तो ख़ुदा से दुआ क्यों माँगी जाए?
होना तो वही है जो हमारे इख़्तियार में है।
जवाब:
ख़ुदा ने असबाब का इख़्तियार हमें दे रखा है,
लेकिन उस पर नतीजों की गारंटी नहीं दी है।
यानि एक ज़मीन आपके पास है,
फ़सल बोने के लिए आब-ओ-हवा मुनासिब है,
आपको इख़्तियार है कि
उसमें गेहूँ बोएँ
या भांग / पोस्त की फ़सल लगाएँ।
लेकिन इससे आपको गेहूँ या भांग
ज़रूर ही मिल जाए —
इसकी कोई गारंटी नहीं।
मुमकिन है आपने गेहूँ बोया
लेकिन गेहूँ उगा ही नहीं,
या उगा लेकिन बालियाँ नहीं आईं,
या बालियाँ आईं
लेकिन वक़्त से पहले सूख गईं।
इसीलिए ख़ुदा से दुआ
असबाब पर नतीजे उतरने के लिए की जाती है।
अगर कोई भांग की फ़सल बोकर
गेहूँ की उम्मीद लगाए बैठा है,
तो यह ख़ुदा के बनाए हुए निज़ाम के ख़िलाफ़ है।
गेहूँ बोकर
गेहूँ की दुआ करना —
यही मतलूब है।
✍️अब्दुल्लाह मुमताज़ क़ासिमी

0 टिप्पणियाँ