✨❄ इस़लाहे़ अग़लात़: अ़वाम में राएज ग़लतियों की इसलाह़ ❄✨
सिलसिला 34:
🌻*गुनाहों, रियाकारी और खुद-पसंदी के वसवसों का इलाज*
🌻 *गुनाहों के वसवसों का ह़ुक्म और उन का इलाज:*
दिल में ना चाहते हुए भी बिला इखतियार गुनाहों के जो वसवसे (और खयालात) आते हैं कि दिल कोई गुनाह करने का तक़ाज़ा करता है तो उस से हरगिज़ परेशान नहीं होना चाहिए, इन वसवसों का आना तक़वा (और परहेज़गारी) के हरगिज़ खिलाफ नहीं, ऐसे ग़ैर इखतियारी (अपने इरादे के बगैर आने वाले) वसवसों पर जब तक अमल ना केया जाए तो यह माफ हुआ करते हैं, इस लिए गुनाहों के ऐसे वसवसे आने के बाद उन के तक़ाज़े पर अमल ना किया जाए, बल्कि उन की तरफ किसी क़िस्म की कोई तवज्जुह ना दी जाए, और इस से बचने के लेए अपने आप को किसी नेक या जाइज़ काम में मशग़ूल कर लिया जाए, क्योंकि मशगूल आदमी को ऐसे वसवसे उमूमन नहीं सताया करते बल्कि फारिग (और काम से खाली आदमी) ही इन का शिकार बना रहता है. अल्बत्ता अपने इरादे और इखतियार से गुनाहों के खयालात दिल में लाना निहायत ही बुरा और अल्लाह तआला की नाराज़गी का सबब है.
सह़ी बुखारी में है कि हुजूर अक़दस ﷺ ने इरशाद फरमाया कि “अल्लाह तआला ने मेरी उम्मत के दिलों में पैदा होने वाले वसवसों को माफ कर दिया है जब तक वह उन पर अमल ना करें [अगर उन का तअल्लुक़ अमल के साथ हो], और कलाम ना करें (ज़बान पर ना लाएं) [अगर उन का तअल्लुक़ गुफ्तुगू के साथ हो].
2528- عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ ﷺ: «إِنَّ اللهَ تَجَاوَزَ لِي عَنْ أُمَّتِي مَا وَسْوَسَتْ بِهِ صُدُورُهَا مَا لَمْ تَعْمَلْ أَوْ تَكَلَّمْ».
गोया कि गैर इखतियारी तौर पर (अपने इरादे के बगैर) वसाविस (वसवसे) आने के बाद जब तक वह ज़बान या दीगर आजा (बदन के किसी हिस्से) के ज़रिए वह गुनाह नहीं करेंगे तब तक ऐसे वसाविस माफ हैं.
यह ह़दीस यक़ीनन बहुक बड़ी तसल्ली का बाइस (और इतमीनान का सामान) है उन लौगों के लिए जो दिल में गैर इखतियारी तौर पर आने वाले गुनाहों के वसवसों की वजह से परेशान रहते हैं।
🌻 *किसी नेक अ़मल से मुतअल्लिक़ रियाकारी के वसवसों का हुक्मः*
एक आदमी अल्लाह तआला के लिए कोई नेक अमल शुरू करता है, फिर दिल में रियाकारी का वसवसा आता है जिस से वह परेशान हो जाता है, हत्ता कि मायूस हो कर हिम्मत हार देता है, कि जब रियाकारी ही कर रहा हूं तो फिर अमल करने का क्या फायदा?? यह (बीमारी और) मर्ज़ दीनदार तबक़े को बकसरत लाहिक़ होता (और बहुत ज़्यादा पैश आता) है, क्योंकि यह भी एक शैतानी चाल होती है कि यह नेक बंदा रियाकारी की परेशानी में मुब्तला हो कर हिम्मत हार कर बैठ जाए। ऐसे ह़ज़रात को चंद अहम निकात (और प्वाइंट) समझने और याद रखने चाहिएः
☀ पहला नुकता यह है कि रियाकारी और रियाकारी का वसवसा (दिखलावा करना और दिखलावा करने का वसवसा और खयाल आना) दो अलग अलग चीज़ें हैं, दोनों को एक समझना गलती है और यह परेशानी भी इसी लिए पैदा होती है कि दोनों में फर्क़ नहीं कर पाते, इस लिए यह समझ लेना चाहिए कि रिया (दिखलावे) का वसवसा हरगिज़ रिया नहीं, क्योंकि रिया (और दिखलावा) तो अपने क़स्द और इखतियार से होता है कि उस आदमी का मक़सद ही दिखलावा और नाम व नमूद होता है, लेकिन जहां रियाकारी का इरादा ना हो बल्कि एक नेक अमल अल्लाह के लिए किया जा रहा है और इसी दौरान दिल में रिया का वसवसा आए तो उस को रिया नहीं कहते।
☀ दूसरा नुकता यह है कि उस रियाकारी के वसवसे से परेशान हो जाना भी इस बात की वाज़ेह़ (और साफ़) दलील है कि यह रिया नहीं बल्कि रिया (और दिखलावे) का वसवसा है, क्योंकि जिन का मक़सद ही रिया होता है उन को परेशानी किस बात की?? वह तो चाहते ही यही हैं कि इस नेक अमल से नाम व नमूद और शुहरत ह़ासिल हो।
☀️ तीसरा नुकता तसल्ली की खातिर ये अर्ज़ है कि रियाकारी के खौफ (और दिखलावे के डर) से कोई नेक अमल तर्क कर देना (और छोड़ देना) बज़ाते खुद भी रिया (और दिखलावा) है, कियोंकि जब एक नेक अ़मल अल्लाह ही के लिये है तो फिर वो मखलूक़ की खातिर तर्क कर देना (और छोड़ देना) हरगिज़ दुरुसत नहीं बलकि ये भी इखलास के खिलाफ है, इखलास यही है कि अल्लाह तआला की रज़ा के लिये नेक अमल किया जाये और उस में मखलूक़ के मदह़ व ज़म यानी तारीफ व मुज़म्मत (और बुराई) की हरगिज़ परवा ना की जाये।
और ये भी वाज़ेह रहे कि जब रियाकारी के खौफ से कोई नेक अमल छोड़ने की कोशिश की जाये तो इस तरह शैतान रियाकारी का वस्वसा ला ला कर हर एक नेक अमल छुड़ा लेगा,ज़ाहिर है कि ये किस क़दर खसारे (और घाटे) की बात है!!
☀️ *एक अहम वज़ाहत:*
मा क़ब्ल (ऊपर) की तफ़्सील से मक़सूद सिर्फ ये है कि नेक आमाल में मशगूल हज़रात शैतानी वसाविस (वसवसों) से परेशान ना हों और मायूस हो कर ना बैठें बल्कि वो दिल जमई़, हिम्मत और हौसले से अमल करते जाएं, लेकिन इसका ये मक़सद हरगिज़ नहीं, कि हम इखलास का दावा कर बैठें और अपने आमाल को इखलास की सनद दे कर रियाकारी से बिल्कुल्लिया (पूरे) मुत्मइन हो जाएं और अपने आप को मुख्लिस समझें, ऐसा हरगिज़ नहीं होना चाहिए बल्कि होना ये चाहिए कि हर नेक अमल अल्लाह ही के लिये शुरू करें और करते जाएं, साथ साथ डरते जाएं कि ये अल्लाह को क़ुबूल है भी या नहीं, अल्लाह से क़बूलियत की दुआ भी करते जाएं और क़बूलियत की उम्मीद भी रखते जाएं, इस लिये नफ़्स की सरकशी (और उस की चालों) से किसी भी लम्हे ग़ाफ़िल (और किसी भी वक़्त बे परवा) नहीं होना चाहिए!
और ये एक वाज़ेह हक़ीक़त है कि इखलास पैदा करने के लिये हज़रात मशाइख, (बुज़ुर्गों) और अकाबिर की जूतियां सीधी करनी पड़ती हैं।
🌻 *उ़ज्ब यानी खुद पसंदी (और अपने आप को अच्छा लगने) का वस्वसा और उसका हल:*
अपनी किसी नेकी या खूबी की वजह से अपने आप को अच्छा समझना उ़ज्ब यानी खुद पसंदी कहलाता है, जो कि एक संगीन (और बड़ा) रूहानी मर्ज़ है, हर मुसलमान को इस से बचना चाहिए कियोंकि इंसान का अपना कोई कमाल नहीं बल्कि जो कुछ भी खूबी है वो अल्लाह ही की तरफ से होती है, इसी तरह कोई नेकी करना भी अल्लाह ही की तौफ़ीक़ से होता है, इस लिये हर खूबी और नेकी पर अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए, ना ये कि इस बात को नज़र अंदाज़ करके अपने को अच्छा समझा जाए। अलबत्ता बाज़ लोगों को इस उ़ज्ब (और खुद पसंदी) का वस्वसा आता है, जिस से वो परेशान हो जाते हैं, याद रहे कि जब बंदा हर खूबी और हर नेकी को अल्लाह ही की तौफ़ीक़ समझता है उसका शुक्र अदा करता है और अपना कोई कमाल नहीं समझता तो इसके बाद दिल में उ़ज्ब का जो भी वस्वसा आये तो ये परेशानी की बात नहीं, कियोंकि उ़ज्ब (और खुद पसंदी) का वस्वसा हरगिज़ उ़ज्ब नहीं, और फिर इस वस्वसे से परेशान होना भी इस बात की वाज़ेह अलामत है कि ये उज्ब नहीं बल्कि उज्ब का वस्वसा है कियोंकि जिनको उ़ज्ब (और खुद पसंदी) का मर्ज़ होता है उनको परेशानी किस बात की!! मज़ीद तफ़्सील वही है जो रियाकारी की बहस में (ऊपर) ज़िक्र हो चुकी।
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अल्तमश आ़लम क़ासमी
9084199927

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