हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ को मुश्किल कुशा कहने का हु़क्म حضرت علیؓ کو مشکل کشا کہنے کا حکم

 ✨❄ इस़लाहे़ अग़लात़: अ़वाम में राएज ग़लतियों की इसलाह़ ❄✨



सिलसिला 25:

🌻 *हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ को मुश्किल कुशा कहने का हु़क्म*


📿* हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ को मुश्किल कुशा कहने की ह़की़क़त और पसे मंज़र:*

हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ फैसला करने और मुश्किल से मुश्किल मसअला ह़ल करने में बड़ी उमदा (और अच्छी) महारत रखते थे, उन की इसी माहिराना सलाहि़यत (और का़बिलियत) की वजह से उन के बारे में हुज़ूर अक़दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि:

"’’وَأَقْضَاهُمْ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ‘‘

कि अ़ली‌ (رضی اللہ عنہ) सब से ज़्यादा फ़ैसला करने में महारत रखते हैं, जैसा कि सुनने इब्ने माजा में है:

154- عَنْ أَبِي قِلَابَةَ عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ: أَنَّ رَسُولَ اللهِ ﷺ قَالَ: «أَرْحَمُ أُمَّتِي بِأُمَّتِي أَبُو بَكْرٍ، وَأَشَدُّهُمْ فِي دِينِ اللَّٰهِ عُمَرُ، وَأَصْدَقُهُمْ حَيَاءً عُثْمَانُ، وَأَقْضَاهُمْ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ، وَأَقْرَؤُهُمْ لِكِتَابِ اللهِ أُبَيُّ بْنُ كَعْبٍ، وَأَعْلَمُهُمْ بِالْحَلَالِ وَالْحَرَامِ مُعَاذُ بْنُ جَبَلٍ، وَأَفْرَضُهُمْ زَيْدُ بْنُ ثَابِتٍ، أَلَا وَإِنَّ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَمِينًا، وَأَمِينُ هَذِهِ الأُمَّةِ أَبُو عُبَيْدَةَ بْنُ الْجَرَّاحِ

यही वजह है कि हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ ने अपनी ज़िंदगी में बड़े बेहतरीन फैसले किए और मुश्किल मसाइल ह़ल फरमाए, ह़त्ता कि बाज़ अहले इल्म ने लिखा है वह अपने ज़माने में "حلّ المُعضَلات" (ह़ल्लुल मुअ़ज़लात) के लक़ब से पहचाने गए, जिस के फारसी में माना हैं: मुश्किल कुशा, यानी मुश्किल मसाइल हल करने वाला। (फतावा मह़मूदियह 1/367)

और मुराद भी यही मतलब था, इस के पीछे कोई शिर्किया, कुफ्रिया या कोई और ग़लत अ़क़ीदा हरगिज़ ना था,

اور اہلِ علم جانتے ہیں کہ یہ جملہ بھی حضرت علی رضی اللہ عنہ کے بارے میں مشہور ہے کہ ’’قضية ولَا أَبا حَسنٍ لها‘‘۔ 

यही वजह है कि हज़रत उ़मर رضی اللہ عنہ ने मुतअ़द्दिद (कई) फैसलों में हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ राए तलब फरमाई और उन के फ़ैसले को सराहा (और तारीफ़ की), इसी एतिमाद की बिना पर हज़रत उ़मर رضی اللہ عنہ की ख्वाहिश होती थी कि मुश्किल फ़ैसलों और मसाइल में उन से भी राए तलब की जाती रहे। बस यही ह़की़क़त है इस जुमले की कि "ह़ज़रत अ़ली मुश्किल कुशा हैं"!


📿 *मुश्किल कुशा सिफत का तअ़ल्लुक़ हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ की ज़िंदगी के साथ है:*

मज़कूरा बाला (ऊपर बतलाई गई) तफ्सील के मुताबिक़ हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ का मुश्किल कुशा होना उन की ज़िंदगी का मुआ़मला था कि हकीकत में वह इस सिफत (और का़बिलियत) के मालिक थे कि मुश्किल मसाइल हल फरमा देते थे इस लिए उन्हें मुश्किल कुशा कहा गया, और जिन अकाबिर (और बुजुर्गों) के कलाम में हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ के साथ "मुश्किल कुशा" का लक़ब मिलता है तो वह भी इसी माना में है कि बतोरे सिफत उन के साथ मज़कूर है, जिस से इशारा उन की ज़िंदगी में इसी माहिराना‌ सिफत (और का़बिलियत) की तरफ है जिस की वज़ाह़त (और तफ्सील) माक़ब्ल में (ऊपर) हो चुकी।


📿 *"ह़ज़रत अ़ली मुश्किल कुशा" इस जुमले का ग़ैर शरई़ (शरीअ़त के खिलाफ) और शिरकिया मतलब और अ़क़ीदा:*

लेकिन इंसाफ की नज़र से देखा जाए तो इस मज़कूरा बाला (ऊपर बतलाई गई) तफ्सील से यह कहां साबित होता है कि हज़रत अ़ली رضی اللہ عنہ वफात के बाद भी मसाइल हल कर सकते हैं, या उन को मुश्किलात और परेशानी में पुकारा जा सकता है??

ज़ाहिर है कि यह बातें बिला दलील, क़ुरआन व सुन्नत के वाज़ेह़ खिलाफ बल्कि शिरक के क़बील से हैं। यही अहले सुन्नत वल जमात का अ़कीदा है। और एक वाज़ेह़ (और जा़हिर) सी बात यह है कि मुश्किलात (और मुसीबतों) में हज़रत अली رضی اللہ عنہ को पुकारने का शिरकिया अ़कीदा तो हज़रत अली رضی اللہ عنہ की ज़िंदगी में भी ना था, तो उन (की वफात) के बाद कैसे दुरुस्त हो सकता है??


📿 *ह़की़की़ मुश्किल कुशा सिर्फ़ अल्लाह है!*

ह़की़क़त यह है कि क़ुरआन व सुन्नत के बहुत से दलाइल की रोशनी में यह बात बख़ूबी वाज़ेह़ (और ज़ाहिर) है कि अल्लाह ही हा़जत रवा और मुश्किल कुशा है जो हर परेशानी को दूर करता है, मुश्किलात (और परेशानियों) के ह़ल में उसी को पुकारना ईमान है, यही अ़की़दा तोह़ीद (और अल्लाह को एक मानने) का तका़ज़ा है।

इस से मालूम हुआ कि ह़क़ीक़ी मुश्किल कुशा सिर्फ़ अल्लाह ही है, जबकि हज़रत अली رضی اللہ عنہ को मुश्किल कुशा कहना इस माना में (यानी ह़क़ीक़ी मुश्किल कुशा मानने) में हरगिज़ नहीं, क्योंकि यह तो शिरकिया अ़की़दा बन जाएगा।


☀️ *तम्बीह:*

चूंकि बहुत से अ़वाम इस ह़की़क़त और पसे मंज़र से वाक़िफ नहीं होते (कि हज़रत अली को मुश्किल कुशा कहना किस लिहा़ज़ से है) इस लिए उन के नज़रियाती तह़फ्फुज़ की खातिर (लोगों के अ़की़दे और नज़रिए को ग़लती और गुमराही से बचाने के लिए) उन के सामने हज़रत अली رضی اللہ عنہ को मुश्किल कुशा कहने से इजतिनाब करना (और बचना) चाहिए।


✍🏻: मुफ्ती मुबीनुर रह़मान साह़ब दामत बरकातुहुम

फाज़िल जामिआ़ दारुल उ़लूम कराची

हिंदी तर्जुमा व तसहील:

अल्तमश आ़लम क़ासमी

9084199927

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