कोर्स मुकम्मल...



कोर्स की तकमील


तहरीर: मुहीउद्दीन फारूक


डॉक्टर हो, इंजीनियर हो या किसी इदारे से मुख्तसर मुद्दती किसी ज़बान का कोर्स मुकम्मल करने वाला—हर शख़्स अपने कोर्स के इख़्तिताम पर खुशी महसूस करता है। और कामयाबी पर खुशी का इज़हार भी मुख्तलिफ अंदाज़ में किया जाता है।


इसके बाद लोग उसकी ज़िन्दगी में एक नुमायाँ तब्दीली की उम्मीद रखते हैं—और अक्सर उसका मुशाहिदा भी करते हैं। अगर कोई डॉक्टर बना हो तो वह रोज़ाना एक मख़सूस लिबास में दवाखाने की तरफ जाता दिखाई देता है, उसकी गुफ़्तगू और उसके गर्द-ओ-नवाह के लोग भी रफ़्ता-रफ़्ता उसी शोबे से वाबस्ता नज़र आने लगते हैं। यही हाल दीगर तलबा का भी होता है जो अपने मुन्तख़ब मज़ामीन में तालीम मुकम्मल करते हैं; यहाँ तक कि किसी ज़बान का कोर्स करने वाला भी उस ज़बान के इस्तेमाल, महारत, और अपने माहौल में उसके असरात के ज़रिए पहचाना जाता है।


लेकिन एक दूसरा गिरोह भी होता है—ऐसे अफ़राद का, जो कितने ही कोर्स कर लें, कितनी ही असनाद [और डिग्रियां] हासिल कर लें, मगर उनकी रोज़मर्रा ज़िन्दगी, रहन-सहन और रवैये में कोई खास तब्दीली नज़र नहीं आती। वह बदस्तूर दूसरों पर इनहिसार करते हैं, और उनकी जद्दोजहद भी उसी दायरे में महदूद रहती है। ऐसे लोगों को देखकर मुआशरा उनके बारे में अच्छा गुमान नहीं रखता; बल्कि उन्हें ग़ैर संजीदा और ग़ैर मोअस्सिर अफ़राद में शुमार किया जाता है।


इसी तरह इंसान की तरबियत के लिए ख़ालिक़-ए-काइनात ने निहायत मुनज़्ज़म निज़ाम रखा है।

इंसान के अंदर ख़ैर-ओ-शर का शऊर वदीअत (अच्छाई बुराई का एहसास) किया गया, फिर उसकी रहनुमाई के लिए अंबिया अलैहिमुस्सलाम के ज़रिए वाज़ेह अहकामात नाज़िल किए गए, ताकि इंसान अपने नफ़्स का तज़किया (और सफाई) करे और दुरुस्त रास्ता इख़्तियार करे।


अगर इसे एक निज़ाम-ए-तालीम समझा जाए तो यह हक़ीक़त वाज़ेह होती है कि कोई शख़्स सिर्फ किसी मुस्लिम घर में पैदा हो जाने से मुसलमान नहीं बन जाता, जब तक कि वह इस “कोर्स” को अमलन मुकम्मल न करे। जिस तरह डॉक्टर के घर पैदा होना उस बच्चे के लिए डॉक्टर बनने में मुआविन तो हो सकता है, लेकिन वह बच्चा महज़ निस्बत की बुनियाद पर डॉक्टर नहीं कहलाता, बल्कि उसे बाकायदा तालीम और मेहनत के बाद ही यह मक़ाम हासिल होता है, इसी तरह मुसलमान होना भी महज़ निस्बत नहीं बल्कि अमल और सई का तकाज़ा करता है।


मुसलमान होना इंसान की अपनी मेहनत, उसकी तालीम, उसके रवैये, और अल्लाह की तरफ से आने वाले इम्तिहानात में उसकी कारकर्दगी पर मुनहसिर है।


इसी मक़सद के लिए हर साल एक महीना—रमज़ान—बतौर तरबियती कोर्स अता किया जाता है, ताकि जो लोग आगे बढ़ चुके हैं वह मज़ीद तरक़्क़ी करें, और जो पीछे रह गए हैं वह तौबा के ज़रिए नई शुरुआत करें और खुद को आइंदा के इम्तिहानात के लिए बेहतर तैयार करें।


यह कोर्स सब के लिए यकसां है, इसका निसाब भी एक है और तरीका भी एक।

हम अभी इसी रमज़ान की तरबियत से गुज़रे हैं, अब हमें खुद अपना जायज़ा लेना चाहिए:


क्या हमारे अंदर वह मतलूबा तब्दीलियाँ पैदा हुई हैं?

क्या हमें इस बात की खुशी है कि इस बार हमने बेहतर तरबियत हासिल की और हम अपने अंदर तब्दीली महसूस कर रहे हैं?

क्या हम क़ुरआन के मज़ामीन में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने लगे हैं, और क्या हमारे इर्द-गिर्द (और आस पास) के लोग भी इसमें हमारे साथ शरीक हैं?

क्या इबादात में हमें लुत्फ़ आने लगा है और उनकी अहमियत हमारे दिलों में बढ़ गई है?

क्या तमाम उमूर-ए-ज़िन्दगी में क़ुरआन फ़ैसले का हतमी (यक़ीनी) मैयार बन रहा है?


ईद का दिन तो सब पर तुलूअ होता है, मगर उस दिन की असल खुशी हर एक की अपनी कैफ़ियत पर मुनहसिर है। अगर यह खुशी उस कामयाबी की है जो रमज़ान की तरबियत से हासिल हुई, तो यह एक हक़ीक़ी नेमत है—जिस पर बंदा अपने रब का शुक्र अदा करता है। इसी शुक्र और खुशी के जज़्बे के साथ वह अल्लाह की किब्रियाई बयान करता हुआ ईदगाह की तरफ बढ़ता है, क्योंकि खुशी मनाने का यह तरीका भी उसी रब ने सिखाया है।


अफ़सोस तो उस वक़्त होता है जब इंसान उन लोगों में शामिल हो जाए जो हर कोर्स के बाद भी वैसे के वैसे रहते हैं—न उनके हाल में तब्दीली आती है, न उनके किरदार में निखार। और यूँ वह मुआशरे में बेवक़अती और बुरे असर का कारण बन जाते हैं।


हिंदी तर्जुमा व तहसील: By: Admin Deeni Rahnumayi

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